यहां जिन्न मरीजों का करता है इलाज, औरंगजेब की बेगम को कर चुका है ठीक

jagmau-1463133879कानपुर. गंगा के किनारे बसे जाजमऊ का अपना इतिहास में अलग महत्व है। इसका उल्लेख पुराड़ों से लेकर इतिहास के पन्नों में दर्ज है। यहां पर एक मस्जिद है जिसका नाम जिन्नात है। यह मस्जिद लगभग 450 साल पुरानी है और यहां हररोज सैकड़ों बीमार लोग आते हैं और जिन्न की कृपा से ठीक होकर चले जाते हैं। मौलवी ने बताया कि इस मस्जिद पर आने वाला हर इंसान चाहे वह जिस धर्म से ताल्लुख रखता हो ठीक होकर अपने घर जाता है। बताया औरंगजेब की बेगम कई माह से बीमार थीं। कानपुर क्षेत्र के सिपहसालार कुलीज खान जो कानपुर क्षेत्र का प्रभारी थे ने अपने वजीर को इस मस्जिद के बारे में जानकारी दी। औरंगजेब की बीमार बेगम को देशभर के हकीमी से इलाज करवाया पर वह ठीक नहीं हुईं।
कुरील खान औरंगजेब की बेगम साहिबा को इस मस्जिद पर लेकर आए। वह औरंगजेब की बेगम को लेकर मस्जिद पहुंचे और बुरे शाये को दूर करने के लिए जिन्नातों की मस्ज़िद में नमाज़ अता की थी और यहां पवित्र धागा भी बांधा था। इसके बाद औरंगजेब की पत्नी ठीक हो गई और उसने इस मस्जिद के बारे में पूरे देश के लोगों को बताई।
jajmau jinnat masjidशहर की सबसे पुरानी मानव बस्ती है
उन्नीसवीं शताब्दी में जजेस्मोव के नाम से जाना जाने वाला यह शहर कानपुर के उपनगरीय क्षेत्र में गंगा नदी के किनारे स्थित है। वर्तमान में यह एक औद्योगिक केंद्र है और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अनुसार यह इस क्षेत्र की सबसे पुरानी मानव बस्ती है। खुदाई के दौरान मिले औजार, कलाकृतियां और मिट्टी के बर्तन शहर के इतिहास को 1300 – 1200
बीसीई में ले जाते हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को भी हाथीदांत की एक मुहर मिली है जो चन्द्रगुप्त मौर्य के समय की है।
ये प्रदर्शन वर्तमान में कानपुर संग्रहालय में रखे गए हैं। इस शहर में एक प्राचीन मस्जिद भी है जिसे जिन्नातों की मस्जिद कहा जाता है। पहाडी पर स्थित यह मस्जिद सफ़ेद रंग के कारण वास्तुकला में ताजमहल से मिलती जुलती है और इसी मस्जिद में भूत प्रेत से ग्रसित लोग रोते बिलखते आते हैं और हंसते हुए यहां से जाते हैं।
पाक व अरब देश के लोग यहां पर आते हैं
जिन्नात मस्जिद के मौलवी इसरत हुसैन बताते है कि दुनिया भर से लोग इस जगह की करामात देखने के लिए आते हैं।पाकिस्तान से लेकर अरब और नेपाल के साथ ही अन्य जगहों के जिन्दगी से हारकर जीने की तमन्ना लेकर आते हैं और जिन्न की कृपा से वह ठीक होकर चले जाते हैं। मस्जिद के आसपास बंधे धागे इस बात की गवाही देते हुए दिखते हैं। मौसवी की माने तो मस्जिद में जिन्न व शाया आम आदमी के साथ बैठ कर नमाज़ अता करते हैं। फ़ारियादें सुनते हैं और उसका समाधान निकालते हैं। मौलवी कहते हैं कि इस मस्ज़िद में एक जिन्न आप के साथ नमाज़ पढ़ रहा हो या बात कर रहा हो तो इसका अंदाज़ा आसानी से नहीं लगाया जा सकता।
रातों रात हुआ था मस्जिद का निर्माण
इस मस्जिद का इतिहास बताता है कि आखिर किस तरह एक ही रात में इस मस्ज़िद का निर्माण किसी न दिखने वाली शक्ति ने कर दिया। जिन्नातों की मस्जिद का निर्माण लगभग 450 साल पहले। मौलवी ने बताया कि इस क्षेत्र का राजा हर त्यौहार और पवित्र दिन पर किसी न किसी घर से एक आदमी की बलि चढ़ाता था और उसके खून से अल्लाह को खुश करने की कोशिश करता था। लोग काफी परेशान थे, लेकिन राजा की ताकत के आगे कोई कुछ कर नहीं सकता था, उसी समय एक पीर बाबा ने अपनी ताकत से इस प्रथा को बंद करा दिया।खुश होकर सभी लोगों ने इस मस्ज़िद का निर्माण कराने की ठानी। जिनकी हत्या राजा ने करवाई, उन्हीं की आत्माओं इस मस्जिद को रात में ही खड़ा कर दिया। पीर बाबा ने इसका नाम जिन्नातों वाली मस्जिद दिया। इससे जिन्नों के ऊपर लोगों का भरोसा पैदा हो गया। यहां बुरी आत्माओं से बचने के लिए लोग मन्न्नते मांगते हैं और मस्जिद के दरवजों पर ताला लगाते हैं और कपड़े की गांठ बांधते हैं।

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