कराहते शहर में मोदी के नाम पर किला फतह की मशक्कत

कानपुर. यह मजदूरों का शहर है। यह उद्योगों का भी शहर है। पर अब यहां बस कराहते मजदूर बचे हैं। उद्योग लगातार कम हुए और सरकारों ने कोई परवाह भी नहीं की। इस कराहते शहर की टीस यह है कि पहले विकास की गंगा कानपुर होकर बहती थी, पर पिछले कुछ वर्षों से विकास राजधानी लखनऊ और मुख्यमंत्रियों के गृह जनपदों तक सिमट कर रह गया। उन्हें लगता है कि चुनाव में भी कानपुर किसी की प्राथमिकताओं का हिस्सा नहीं है।भाजपा यहां मोदी के नाम पर किला फतह की मशक्कत में जुटी है, तो सपा-कांग्रेस और बसपा ने नए समीकरणों के साथ ताकत झोंक दी है।
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